Saturday, May 24, 2025

मैंने जब टूटी हुई यादों की चूड़ियाँ समेटीं



मैंने जब टूटी हुई यादों की चूड़ियाँ समेटीं,
हर किरच में बीते पल की झलक थी—धुंधली, मगर गूंजती।
धारदार नोक से रिसने लगी वो खामोशी,
जो कभी चीख न बन सकी, न आह ही।
अब वो चुप्पियाँ, छंदों में बुनती हैं खुद को।

अधूरी कविताएँ थीं जैसे किसी मौसम की अधजली शाम,
जिसने सूरज को डूबते तो देखा, मगर रात को आने से रोका नहीं।
हर अधूरा ख्वाब- एक पंख था,
जो उड़ना चाहता था, पर आसमान को देखता रह गया।
अब वही ख्वाब, शब्दों के परों पर सवार, पन्नों पर उड़ान भरते हैं।

वो बातें—जो होंठों पर आकर थम गई थीं,
अब स्याही में भीगकर बहने लगी हैं।
जैसे बरसों से सूखी नदी को फिर से जल की धारा मिल गई हो।
हर पंक्ति में दबी एक अनकही सिसकी,
जो अब कविता बनकर मुस्कराने लगी है।

शब्दों ने जैसे मेरे भीतर जान फूँक दी,
और हर पंक्ति में कोई अंगारा दहकने लगा।
पर उस दहक में अब जलन नहीं, बस उजाला है—
एक ऐसा उजाला जो दर्द से ही उपजा है,
और जिसने काग़ज़ को मेरा सबसे करीबी आश्रय बना दिया।

अब वो पीड़ा नहीं, एक ठंडी साँस है काग़ज़ पर,
जिसमें तपिश भी है, शांति भी।
मैंने खुद को लिखा, और लिक्खा ही खुद को पाया।
जो टूटा, उसने ही नया आकार लिया—
कविता बनी, और कविता में मैं।

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I write— when silence grows too loud to bear, when thought becomes a knot I cannot untangle. I do not always know what I think, but the pen ...